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आगर मालवा। लोकतंत्र में शासन व्यवस्था का मूल आधार जनता है और जनता तक शासन की नीतियों, योजनाओं और जमीनी हकीकत को पहुंचाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। एक समय था जब अधिकारी और जनप्रतिनिधि पत्रकारों के सवालों को जनता के सवाल समझकर उनका जवाब देना अपनी जिम्मेदारी मानते थे। पत्रकारों को जनता और शासन के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता था।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है। कई स्थानों पर पत्रकारों से दूरी, जनता की शिकायतों के प्रति उदासीनता और अधिकारियों के व्यवहार को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रदेश के नौकरशाह अब जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से पीछे हटने लगे हैं?

क्या ऐसा ही होता है जनता के लिए जनता का शासन? :-

लोकतंत्र में आम नागरिक या पत्रकार का किसी अधिकारी पर प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होता। जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का प्रयास करती है और पत्रकारिता इस व्यवस्था में जनता की आवाज को सामने लाने का काम करती है।

ऐसे में यदि जनता की शिकायतें और पत्रकारों द्वारा उठाए जा रहे सवाल शासन स्तर तक पहुंचने के बाद भी नजरअंदाज होने लगें, तो यह पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है

आगर मालवा जिले का घटनाक :-

आगर मालवा जिले में पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों को ही देखें तो किसानों, आम नागरिकों, शिकायतकर्ताओं, पेंशनर्स और पत्रकारों से जुड़े कई मामले सामने आए हैं, जिन्होंने प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

किसानों से लेकर पत्रकारों तक—हर तरफ उठ रहे सवाल

भारतीय किसान संघ द्वारा कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीणा की कार्यशैली को लेकर निंदा प्रस्ताव पारित किया जाना हो, जनसुनवाई में बार-बार आवेदन देने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने का आरोप हो, या शिकायतकर्ताओं द्वारा निपटारा कार्डों की माला पहनकर अपनी पीड़ा जताने का मामला—हर घटनाक्रम प्रशासन और जनता के बीच बढ़ती दूरी की ओर संकेत करता दिखाई देता है।

वहीं केंद्रीय विद्यालय के सामने स्थित ट्रेंचिंग ग्राउंड का मामला भी कम गंभीर नहीं है। विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से जुड़े इस मुद्दे को लेकर अभिभावकों को आंदोलन, सड़क पर उतरने और आमरण अनशन तक का रास्ता अपनाना पड़ा। सवाल यह है कि यदि किसी समस्या को लेकर अभिभावकों को इस स्तर तक जाना पड़े, तो प्रारंभिक स्तर पर प्रशासनिक संवाद और समाधान की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

इसी तरह मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के शिविर में अपनी समस्या बताने पहुंचे शिकायतकर्ता से कथित तौर पर माइक लिए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। जिस कार्यक्रम का उद्देश्य ही जनता में शासन के प्रति विश्वास पैदा करना है, वहां यदि शिकायतकर्ता को अपनी बात रखने में ही कठिनाई महसूस हो तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि जनता अपनी बात आखिर किसके सामने रखे?

पेंशनर्स और सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जुड़े मामलों में भी समय देने के बावजूद अधिकारियों से मुलाकात नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

और जब सवाल पत्रकारों का हो…

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारों की भूमिका केवल समाचार प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है। पत्रकार जनता की समस्याओं को सामने लाते हैं, शासन-प्रशासन से सवाल पूछते हैं और व्यवस्था के उन पहलुओं को समाज के सामने रखते हैं जिन पर सार्वजनिक चर्चा जरूरी होती है।

ऐसे में यदि पत्रकारों को कवरेज से दूर रखा जाए, संवाद सीमित किया जाए या उन्हें केवल विभागीय अथवा जनसंपर्क विभाग से उपलब्ध कराई गई खबरों तक सीमित रहने की स्थिति पैदा हो, तो यह पत्रकारिता की स्वतंत्र भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

प्रश्न यह नहीं है कि किसी पत्रकार को कितना महत्व दिया जा रहा है। असली प्रश्न यह है कि जनता के सवाल पूछने की स्वतंत्रता कितनी सुरक्षित है?

उपरोक्त परिस्थितियों में आगर मालवा जिले में पत्रकारों के सामने निर्मित हो रही अप्रिय स्थिति को लेकर पत्रकारों ने भी कलेक्टर डॉ शेर सिंह मीणा के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर उन्हें तत्काल आगर मालवा जिले से हटाकर किसी जिम्मेदार अधिकारी को नियुक्त करने की मांग शासन से की है।

जनप्रतिनिधियों से भी उम्मीद, लेकिन निराशा क्यों ?

इन घटनाक्रमों से प्रभावित किसान, आम नागरिक और पत्रकार ऐसा नहीं है कि अपने जनप्रतिनिधियों तक नहीं पहुंचे। चुनाव के दौरान जनता के बीच जाकर बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधियों से भी समस्याओं के समाधान की अपेक्षा स्वाभाविक है।

लेकिन यदि शिकायतों और आग्रहों के बावजूद प्रशासनिक व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं देता, तो पीड़ित पक्ष के भीतर निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल जन्म लेता है—

क्या नौकरशाहों पर नियंत्रण और उन्हें जवाबदेह बनाने वाली शासन व्यवस्था पर्याप्त रूप से सक्रिय है?

यदि कोई अधिकारी जनता की शिकायतों, किसानों की नाराजगी, पत्रकारों के सवालों अथवा जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों को लगातार नजरअंदाज करने की स्थिति में पहुंच जाता है, तो क्या इसकी समीक्षा करने की जिम्मेदारी शासन की नहीं है?

लोकतंत्र में अधिकारी जनता के सेवक और शासन के प्रतिनिधि होते हैं। उनके पास प्रशासनिक अधिकार जरूर होते हैं, लेकिन उन अधिकारों का अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा और शासन की नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन ही है।

यदि जनता को अपनी समस्या बताने के लिए बार-बार जनसुनवाई में जाना पड़े, किसान को आंदोलन करना पड़े, अभिभावकों को सड़क पर उतरना पड़े, शिकायतकर्ता को अपनी आवाज बुलंद करने के लिए असामान्य तरीके अपनाने पड़ें और पत्रकारों को अपने सवाल पूछने के लिए संघर्ष करना पड़े, तो निश्चित रूप से व्यवस्था के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता है।

और अंततः वही सवाल फिर सामने खड़ा है—

क्या प्रदेश की जनता से कहीं कोई गलती हो रही है ?

यह सवाल आगर मालवा से उठ रहा है, लेकिन इसका जवाब पूरे प्रदेश को तलाशना होगा।

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