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आगर-मालवा | विशेष रिपोर्ट गिरीश सक्सेना

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ की युगलपीठ ने 5 नवंबर 2026 को जिला प्रशासन की रिट अपील खारिज कर दी हे और इसी के साथ कुंडालिया बांध परियोजना के डूब प्रभावित किसानों के मुआवजे से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिस मुआवजे की राशि करीब 20 करोड़ 48 लाख रुपये थी, वह अब ब्याज सहित बढ़कर लगभग 30 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

सवाल यह है कि आखिर शासन को लगभग 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक भार क्यों उठाना पड़ रहा है? क्या यह किसी अधिकारी की गलती का परिणाम है या फिर किसी अधिकारी द्वारा अपनी कार्रवाई को सही साबित करने की जिद में शासन को इतनी बड़ी आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है?

दरअसल, कुंडालिया बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले ग्राम धनोरा की जमीन और उस पर बने निर्माण के मुआवजे का यह पूरा मामला है।

इस मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ की युगलपीठ ने 5 नवंबर 2026 को शासन की रिट अपील खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की पीठ ने एकलपीठ द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा है। इस फैसले से प्रभावित किसानों को बड़ी राहत मिली है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, ग्राम धनोरा की कुल 16.760 हेक्टेयर जमीन कुंडालिया बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आई थी। इसमें 9.166 हेक्टेयर जमीन का आपसी सहमति से विनिमय हुआ, जबकि शेष 7.594 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया।

17 अक्टूबर 2023 को एसडीएम एवं भू-अर्जन अधिकारी सुसनेर-नलखेड़ा द्वारा जमीन और उस पर मौजूद निर्माण के लिए कुल 20 करोड़ 48 लाख 76 हजार 174 रुपये का मुआवजा अवॉर्ड पारित किया गया था।

लेकिन मुआवजे की राशि का भुगतान समय पर नहीं हुआ। इसके बाद प्रभावित किसानों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने 11 जुलाई 2024 को मुआवजा राशि ब्याज सहित 60 दिनों के भीतर भुगतान करने के निर्देश दिए। इसके बाद 12 सितंबर 2024 को भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

लेकिन इसी बीच प्रशासन ने टीन शेड के निर्माण और उनके मूल्यांकन पर सवाल उठाते हुए जांच शुरू कर दी। कलेक्टर द्वारा जांच समिति गठित की गई और 13 तथा 18 नवंबर 2024 को प्रभावित किसानों को नोटिस जारी कर दोबारा दस्तावेज मांगे गए। साथ ही मुआवजे की पुनर्गणना की कार्रवाई शुरू करने की बात कही गई।

प्रशासन की इस कार्रवाई को किसानों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकलपीठ ने 1 दिसंबर 2025 को इन नोटिसों को निरस्त कर दिया।

इसके बाद शासन ने इस फैसले को चुनौती देते हुए युगलपीठ में रिट अपील प्रस्तुत की।

लेकिन हाईकोर्ट की युगलपीठ ने भी शासन की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और 5 नवंबर 2026 को रिट अपील खारिज कर दी।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 33 के तहत कलेक्टर को केवल लिपिकीय अथवा गणितीय त्रुटियों में सुधार करने का अधिकार है। इस प्रावधान के आधार पर पहले से पारित संपूर्ण मुआवजा अवॉर्ड की दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि 27 सितंबर 2024 की संयुक्त जांच रिपोर्ट में टीन शेड मौके पर मौजूद होने और बारिश के पानी के बहाव से क्षतिग्रस्त होने का उल्लेख था।

इस प्रकार शासन की रिट अपील खारिज होने के बाद प्रशासन द्वारा मुआवजे की दोबारा जांच के लिए जारी किए गए नोटिस निरस्त ही रहेंगे।

अब समझिए शासन पर कैसे बढ़ सकता है आर्थिक बोझ

इस पूरे मामले में अधिवक्ता गौरव श्रीवास्तव ने बताया कि मूल विवाद की शुरुआत किसानों द्वारा प्रस्तुत याचिका से हुई थी। किसानों ने मुआवजा राशि का भुगतान नहीं होने पर उच्च न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय ने भू-अर्जन अधिकारी एवं एसडीएम सुसनेर को निर्धारित अवधि में अवॉर्ड की राशि ब्याज सहित जारी करने के निर्देश दिए थे।

अधिवक्ता श्रीवास्तव के अनुसार, भू-अर्जन कानून के प्रावधानों के तहत निर्धारित परिस्थितियों में मुआवजा राशि का भुगतान एक वर्ष के भीतर नहीं होने पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का प्रावधान लागू होता है।

उनका कहना है कि शासन को मूल अवॉर्ड की राशि तो किसानों को देनी ही है, साथ ही लागू ब्याज का भुगतान भी करना होगा। इसी आधार पर करीब 20 करोड़ 48 लाख रुपये की मूल मुआवजा राशि अब ब्याज सहित लगभग 30 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

हालांकि यह राशि ब्याज की वास्तविक गणना और भुगतान की तारीख के आधार पर निर्धारित होगी।

अब सबसे बड़ा सवाल…

जब किसानों के पक्ष में मुआवजे का अवॉर्ड पारित हो चुका था और जब उच्च न्यायालय भी भुगतान के निर्देश दे चुका था, तो आखिर दोबारा जांच और नोटिस जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

क्या प्रशासनिक स्तर पर समय रहते सही निर्णय लिया जाता तो शासन को इस अतिरिक्त आर्थिक भार से बचाया जा सकता था?

क्या इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी?

और यदि शासन को जनता के खजाने से करोड़ों रुपये अतिरिक्त ब्याज के रूप में चुकाने पड़ते हैं, तो इस आर्थिक नुकसान की जवाबदेही आखिर किसकी होगी?

किसानों को हाईकोर्ट से राहत जरूर मिल गई है, लेकिन अब निगाहें शासन पर हैं कि वह इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करता है या फिर करोड़ों रुपये के इस अतिरिक्त बोझ को भी सरकारी खर्च मानकर आगे बढ़ जाता है।

आखिर जनता के पैसे की जवाबदेही कौन लेगा?

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