आगर-मालवा-
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बड़ागांव (विकासखंड नलखेड़ा) की कक्षा 11 के छात्र- छात्राओं नम्रता राजपूत, खुशी माली एवं चंदन मालवीय ने विद्यालय की विभिन्न गंभीर अव्यवस्थाओं को लेकर कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचकर कलेक्टर को आवेदन दिया है।
पूरे आरोपों में सबसे खास बात यह है कि उनके गणित के शिक्षक रमेश चंद्र यादव को उनके विद्यालय जो की एक संकुल केंद्र भी हे का प्रभारी प्राचार्य बना दिया गया है और इसके चलते प्रभारी प्रचार्य अब उनको गणित नहीं पड़ाते बल्कि वहां अपने निजी निवास पर कोचिंग लेते हैं और वहां पर गणित पढ़ाते हे।
अपने साथ हो रही इस इंसाफी की शिकायत को लेकर छात्र-छात्राएं कलेक्टर महोदय के पास पहुंचे और उन्हें अपनी समस्या बताई। कलेक्टर ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए समस्या के शीघ्र निराकरण करने का आश्वासन छात्र छात्राओं को दिया है।
प्राचार्य रमेश चंद्र यादव से जब गिरीश न्यूज़ ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि विद्यालय में एकमात्र गणित शिक्षक का पद स्वीकृत है और वह पद उन्हीं के पास है। प्राचार्य होने के नाते उन पर प्रशासनिक कार्यों का अत्यधिक बोझ है। विद्यालय में न तो कोई बाबू (लिपिक) है और न ही कोई कंप्यूटर ऑपरेटर, जिससे सारा कार्यालयीन कार्य उन्हें ही संभालना पड़ता है। इसी कार्यभार के चलते वे अपने विषय की क्लास कक्षा 11 एवं 12 में नहीं ले पाते हैं इसके चलते इन कक्षाओं में गणित विषय नहीं पढ़ाया जा रहा है।
इसके अलावा उन्होंने बाकी अन्य तरह की सारी शिकायतों जो सेनेटरी पैड,पेयजल और खेल मैदान से संबंधित है को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ विद्यालय के अन्य शिक्षकों की एक गहरी साजिश बताया है।
प्राचार्य ने कहा कि विद्यालय के ही कुछ शिक्षक स्कूल का चार्ज लेना चाहते हैं, इसलिए वे मासूम छात्रों को भड़का रहे हैं और उनके माध्यम से झूठी शिकायतें करवा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं विद्यालय का चार्ज छोड़ना चाहते हैं।
साथ ही छात्रों और अन्य माध्यमों से उनके ऊपर जो निजी कोचिंग चलाने का आरोप लगाया गया है, उसे भी प्राचार्य ने असत्य बताया है।
जिला शिक्षा अधिकारी ने बताया –
इस संबंध में जब जिले के शिक्षा अधिकारी नीतीश पांडे से गिरीश न्यूज़ ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि अभी तक यह मामला उनकी जानकारी में नहीं था हमारे बताने पर ही उन्हें यह जानकारी मिली है वह दिखवाते हैं और जो भी नियम अनुसार कार्रवाई होगी वह की जाएगी।
आखिर जिम्मेदार कौन ?
बड़ागांव के शासकीय विद्यालय का यह मामला एक बार फिर से उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जो देश के तमाम सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि एक विद्यालय आखिर किस प्राथमिकता के लिए बना है—छात्र-छात्राओं के भविष्य और उनकी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए, या फिर विद्यालय से जुड़े अंतहीन शासकीय और कागजी कार्यों को पूरा करने के लिए?
इस पूरे प्रकरण में यह बात बिल्कुल साफ नजर आ रही है कि प्रशासनिक और लिपिकीय कार्यों को पूरा करने के चक्कर में बच्चों की शिक्षा के साथ सीधा समझौता किया जा रहा है। प्राचार्य महोदय का यह तर्क अपनी जगह एक प्रशासनिक लाचारी को बयां कर सकता है कि विद्यालय में बाबू या कंप्यूटर ऑपरेटर न होने के कारण सारा दफ्तरी काम उन्हें ही संभालना पड़ता है, जिसके चलते वे गणित की कक्षाएं नहीं ले पाते। लेकिन, इसके साथ ही यह सवाल भी उतना ही गंभीर है कि यदि एक शिक्षक ही पूरा दिन कार्यालयीन फाइलों और दस्तावेजों में उलझा रहेगा, तो फिर उस स्कूल के बच्चों को पढ़ाएगा कौन? क्या बच्चों का भविष्य इन प्रशासनिक मजबूरियों की भेंट चढ़ जाने के लिए है?
लगभग इसी तरह के कई प्रकरण आए दिन हमें शिक्षा व्यवस्था में देखने को मिलते हैं, जो कि बेहद चिंताजनक और गलत हैं। जब शिक्षा के मंदिर में इस तरह की व्यवस्थागत लाचारी और अंदरूनी खींचतान (जैसे शिक्षकों और प्राचार्य के बीच वर्चस्व की लड़ाई) सामने आती है, तो नुकसान अंततः उन मासूम विद्यार्थियों का होता है जो बड़ी उम्मीदों के साथ स्कूल पहुंचते हैं।
आखिर इसके लिए जिम्मेदार किसे माना जाए और कौन इसे सुधरेगा ?
क्या इसकी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जो स्कूलों में पर्याप्त अमला (बाबू और ऑपरेटर) मुहैया नहीं करा पा रही है? या फिर उन जिम्मेदार अधिकारियों की है जो ऐसी अव्यवस्थाओं पर लंबे समय तक आंखें मूंदे रहते हैं?
अब वक्त आ गया है कि शिक्षा विभाग और शासन इस गंभीर विसंगति पर आत्ममंथन करे। जब तक स्कूलों में पढ़ाई को पहली प्राथमिकता नहीं बनाया जाएगा और प्रशासनिक बोझ से शिक्षकों को मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था का पटरी पर लौटना मुश्किल नजर आता है-
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