चिंतन – गिरीश सक्सेना संपादक MA ( Mass Communication ), L. LB.
नीट (NEET) परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के समाचारों के बाद देश भर के छात्रों द्वारा किया गया विरोध-प्रदर्शन पूरी तरह स्वाभाविक, स्वाभाविक रूप से तर्कसंगत और जायज था। किसी भी पारदर्शी व्यवस्था और अपने भविष्य की सुरक्षा चाहने वाले युवाओं का सड़कों पर उतरना एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया थी। किंतु, जब नीट की परीक्षाएं पुनः आयोजित करा ली गईं और प्रवेश प्रक्रिया निर्बाध रूप से आगे बढ़ रही है, तब इस आंदोलन को पुनः हवा देने के प्रयासों ने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों द्वारा इस आंदोलन को नए सिरे से जीवित करने की कोशिशों को देखकर यह सोचना लाजिमी है कि क्या यह वास्तव में छात्रों के हित की लड़ाई है या फिर केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ जन-आक्रोश भड़काने का एक राजनीतिक अवसर ?
विशेष रूप से संसद सत्र के ठीक दौरान विपक्षी दलों की इस अति-सक्रियता ने पूरे घटनाक्रम को एक राजनीतिक रंग दे दिया है। लोकतंत्र का तकाजा तो यह था कि छात्र जंतर-मंतर पर अपनी मांग रखते और विपक्ष संसद के पटल पर इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाता। किंतु, विपक्ष ने संसदीय गरिमा का पालन करने के बजाय जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को उकसाकर आंदोलन का रुख संसद भवन और अति-सुरक्षित प्रधानमंत्री आवास की ओर मोड़ने का प्रयास किया। इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये ने पूरे आंदोलन की पवित्रता और मंशा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि देश का छात्र वर्ग परीक्षाओं में निरंतर होने वाले पेपर लीक से मुक्ति और पूर्णतः पारदर्शी परीक्षा प्रणाली चाहता है। सरकार ने भी इस मांग की गंभीरता को स्वीकारते हुए संविधान और कानून के तहत दोषियों पर कड़ी कार्रवाई शुरू की है। साथ ही, साफ सुथरी तरीके से पुनः परीक्षा का आयोजन कराकर यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया है कि वह व्यवस्थात्मक सुधारों को लेकर गंभीर है।
इसके बावजूद, शांतिपूर्ण प्रदर्शन को अचानक बिना अनुमति के उच्च-सुरक्षा वाले क्षेत्रों और संसद की ओर ले जाना यह दर्शाता है कि आंदोलन की कमान अब छात्रों के हाथों से निकलकर राजनीतिक दलों के नियंत्रण में जा चुकी है। संसद सत्र के दौरान बिना अनुमति मार्च निकालना, पुलिस बल द्वारा रोकने पर हिंसक गतिविधियों में संलिप्त होना और प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने की कोशिश करना—इसे किसी भी सूरत में लोकतांत्रिक विरोध नहीं कहा जा सकता। यह सीधे तौर पर अराजकता का मार्ग है।
“राजनीतिक महत्वाकांक्षा बनाम जनहित”
यदि ध्येय समस्या का समाधान है , तो वह केवल संवाद और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध से ही संभव है । परंतु जब ध्येय राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हो, तो दुर्भाग्य से देश में अराजकता को ही ‘सहानुभूति और मीडिया फुटेज’ बटोरने का साधन मान लिया जाता है। इस आंदोलन में श्रेय लेने के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दिख रही होड़ यह साबित करती है कि नेताओं की प्राथमिकता छात्रों का भविष्य नहीं, बल्कि अपना राजनीतिक लाभ (माइलेज) है।
यहाँ एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि यदि विपक्ष ऐसे आंदोलनों के जरिए लगातार आक्रामक है, तो फिर वह चुनावों में जनता का भरोसा जीतने में असफल क्यों रहता है?
इसका सीधा कारण यह है कि विपक्ष का एक बड़ा वर्ग जनता के विवेक को कम आंकने की भूल कर बैठता है। वे यह मान लेते हैं कि उनके द्वारा कुछ हजारों की भीड़ के साथ खड़ा किया गया कोई भी नैरेटिव आम जनता आंखें मूंदकर स्वीकार कर लेगी। वे भूल जाते हैं कि देश का ‘मौन बहुसंख्यक’ वर्ग बेहद शांत रहकर सब कुछ देखता है और समय आने पर चुनाव के माध्यम से गलत को सजा और सही को पुरस्कार देता है। आंदोलनों के नाम पर आम नागरिक की दिनचर्या में व्यवधान डालना और देश की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाना ही विपक्ष की बार-बार होती विफलता का मुख्य कारण है। इसके अलावा, जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां जब पेपर लीक जैसी घटनाएं हुईं, तब उनका रवैया क्या था? क्या उन्होंने कोई ऐसा अनुकरणीय आदर्श स्थापित किया जिसे वे आज केंद्र सरकार के सामने नजीर के तौर पर पेश कर सकें? बिना ठोस प्रमाणों के जनभावनाओं को भड़काना किसी भी न्यायसंगत आंदोलन को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी ने ‘असहयोग आंदोलन’ जैसे विशाल आंदोलन को केवल इसलिए स्थगित कर दिया था क्योंकि उसमें ‘चौरी-चौरा’ कांड जैसी हिंसा का समावेश हो गया था। गांधी जी के लिए साधन की पवित्रता साध्य जितनी ही महत्वपूर्ण थी। किंतु, आज के दौर में राजनीति हर विरोध को उस मोड़ तक ले जाना चाहती है जहाँ हिंसा हो, ताकि इसका दोष सत्ता पक्ष पर मढ़ा जा सके। जब उनसे नियम तोड़ने पर सवाल किया जाता है, तो वे सीधे जवाब देने के बजाय कुतर्कों का सहारा लेने लगते हैं।
उदाहरण के लिए, परीक्षा में पारदर्शिता और तकनीकी सुधार की मांग तक तो छात्रों की बात समझ आती है, लेकिन अचानक ‘शिक्षा मंत्री के इस्तीफे’ की मांग को केंद्र बिंदु बना देना शुद्ध रूप से राजनीतिक एजेंडा है। जब ऐसी ही स्थितियां गैर-भाजपा शासित राज्यों में बनीं, तब क्या वहां के मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों को तत्काल हटा दिया गया था? व्यवस्था में सुधार की मांग करना जायज है, लेकिन सुधार के नाम पर हिंसा और अराजकता का सहारा लेना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
140 करोड़ की आबादी वाले इस विशाल लोकतंत्र में कुछ हजार लोगों को उकसाकर अराजकता का माहौल बनाना क्षणिक रूप से यह अहसास करा सकता है कि सरकार दबाव में है, लेकिन यह चुनाव जीतने या जनता के दिल में जगह बनाने का रास्ता नहीं हो सकता।
“लोकतांत्रिक मूल्यों और अराजकता में अंतर”
हमें एक बात गहराई से समझनी होगी—एक लोकतांत्रिक राजनीतिक दल और एक अराजक/आतंकवादी सोच में क्या अंतर होता है?
अराजक या हिंसक तंत्र: यह कुछ चुनिंदा लोगों के माध्यम से भय, असंतोष और अराजकता का माहौल बनाकर बहुसंख्यक आबादी को अपनी बात मानने पर मजबूर करने की कोशिश करता है।
लोकतांत्रिक राजनीतिक दल: यह अपने सकारात्मक कार्यों, नीतियों और विचारों को जनता के सामने निष्पक्ष रूप से रखता है, ताकि लोकतंत्र के महापर्व (चुनाव) में जनता बिना किसी भय के अपने विवेक से शासन का निर्णय कर सके।
राजनीति में ‘शॉर्टकट’ आपको कुछ समय के लिए चर्चाओं और समाचारों की सुर्खियों में तो ला सकता है, लेकिन वह जन-मन में स्थायी स्थान नहीं दिला सकता। जब कोई राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मर्यादाओं को छोड़कर अराजक कार्यप्रणाली अपनाने लगता है, तो वह जनता का विश्वास खो देता है।
“ सफलता के लिए गहरी सोच और संकल्प की आवश्यकता”
छात्रों का हो या किसी अन्य सामाजिक वर्ग का, आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण, नियमबद्ध और संकल्पनिष्ठ होना चाहिए। जनहित के मुद्दों पर असहमति और संघर्ष लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन उस संघर्ष का जरिया संवैधानिक होना चाहिए। यदि चुनाव में जनता ने किसी विषय पर अपना जनादेश दे दिया है, तो विपक्षी दलों को यह समझना चाहिए कि जनता फिलहाल उनके नैरेटिव से सहमत नहीं है। यदि उन्हें वास्तव में लगता है कि उनका रास्ता सही है, तो उन्हें उकसावे और हिंसा के बजाय लंबे, शांतिपूर्ण और वैचारिक संघर्ष के लिए तैयार होना चाहिए। क्योंकि यदि मार्ग सत्य और अहिंसा का है, तो देर-सबेर जनता उसे स्वीकार अवश्य करती है—यही भारतीय संविधान और हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों की असली कसौटी है।
वही सत्ताधारी दल को भी चाहिए कि यदि व्यवस्था में कहीं कोई कमी सामने आई है तो उसको तत्काल सुधारा जाये साथ ही उससे प्रभावित हुए लोगों के लिए भी न्यायोंचित सहयोग किया जाए ।
हां यहां एक बात और सभी को ध्यान रखना चाहिए कि यदि आपकी अच्छी कर्मों की तुलना में बुरे कर्म अधिक है तो भी आपको सफलता मिलेगी इसकी काफी कम संभावना है क्योंकि सफलता के लिए अच्छे कर्मों की अधिकता आवश्यक है।
